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toothpaste for dinner

Monday, August 25, 2008

ब्लैक होल

आस्मां के दामन में बिखरे पड़े हैं कितने पल

टिमटिमाते, झिलमिलाते, जलते औ' बुझते पल

जब कोई पल बुझ जाता हैं

सुना हैं आस्मां के सिने में

इक सुराग छोड़ जाता हैं

उस सुराग से ना आवाज गुजरती हैं

ना रौशनी ही गुजर पाती हैं

मेरे सारे ख्वाब मगर

उसी रास्ते से आते हैं, जाते हैं

2 comments:

avi said...

bahut accha poem hai...lekin suraag aur andhera aur roshni...kuch palle nahi pada...

Aliza said...
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