TRY Blogging

toothpaste for dinner

Saturday, August 23, 2008

मौत

मौत, लफ्ज़ कितना हसीं हैं
नींद की ही तरह
दिन भर की दौड़ भाग के बाद
इक शाम कटती नहीं किसी तरह
पर आने वाली नींद की आहट जरुर देती हैं
और पलकों पे रखा बोझ
उतरने से लगता हैं
यह पलकें झपकती हैं,
जो रोको तो छलकती हैं
बेकल हो जाती हैं
नींद के लिए

सुकून और चैन जितना ही महीन
मौत, लफ्ज़ कितना हसीं हैं

1 comments:

Manna said...

http://kashishhh.blogspot.com/2010/02/maut.html

Ek lafz ka sukun hi nahi..
Ek gehri si khwahish hai..

Har pal ke maut se behtareen zindagi ki..

Zinda laashon se behtar murda banne ki..

Maujuda aur mustakbil zakhmon se rihayi ki..
Na guziir rishton ki uljhan se mukti ki..

Maut..
Lafz.. kitna haseen hai...